शनिवार, 23 मई 2015

                                                  22 मई 2015 को एशोसिएशन ओफ़ राजस्थान कोआपरेटिव सबार्डिनेट सर्विसेज का पंजीयन हो जाने से सभी सहकारी निरीक्षकों में अभूतपूर्व रुप से उत्साह का संचार हुआ है । मैं इसे आत्म सम्मान की प्रथम सीढ़ी उत्तीर्ण करने के समान मानता हूं । मनोनीत कार्यकारिणी ने 2 मई 2015 को यही वादा किया था । निश्चित रुप से अध्यक्ष जी, कार्यकारिणी के सदस्य एवम समस्त आम सदस्यगण इस उपलब्धि के लिये बधाई के पात्र हैं ।   

पंजीयन  प्रमाण - पत्र की प्रति 




शनिवार, 16 मई 2015

सहकारिता के क्षेत्र में पहला कदम सहकारी समितियों के पंजीयन से शुरू होता है । किन्ही पंद्रह व्यक्तियों (कम ज्यादा भी हो सकते हैं ) के आवेदन से सहकारी समिति के पंजीयन हेतु आवेदन किया जाता है । इकाई कार्यालय में आवेदन आने पर इकाई अधिकारी किसी निरीक्षक को पंजीयन पत्रादि तैयार कराने हेतु लगा देते हैं । पूर्व में पंजीयन पत्रादि तैयार कराने से पहले संभाव्यता रिपोर्ट ( feasibility or viability report) भी तैयार कराते थे । परन्तु अब इस प्राथमिक कार्य को नजरअंदाज किया जाता है । हालांकि संभाव्यता रिपोर्ट से सहकारी समिति के सफलता पर निरीक्षक अपनी राय तकनीकी तरीके से दे सकते हैं । 
इस  सम्बन्ध में निरीक्षक से निम्नलिखित पूर्तियां कराया जाना अपेक्षित होता है -
1 - इच्छुक सदस्यों को पूर्व निर्धारित स्थान, दिन एवं  समय पर एकत्रित कर प्राथमिक आम सभा आयोजित कराना होता है । इसके पूर्व प्रस्तावित समिति का उपनियम तैयार करा कर सदस्यों के विचारार्थ प्राथमिक आम सभा में रखने की तैयारी करा ली जानी चाहिए ।
आदर्श उपनियम विभाग द्वारा बनाये गये हैं जिसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बिना मौलिक रुप से परिवर्तित किये संशोधन कर अपनाया जा सकता है । दिक्कत अन्य प्रकार की सहकारी समितियों के उपनियम में आ सकती है जिसमें विभाग द्वारा आदर्श उपनियम जारी नहीं किये गये हैं । यह मंच इस कार्य के लिये सभी से आदान प्रदान विचार - विमर्श कर जरुरत के हिसाब से उपनियम बनाने का काम कर सकता है । स्थानीय परिस्थितियों की मांग, आकांछायें, जरुरतें, सावधानियां आदि सम्मिलित करते हुए फ़ीड बैक के आधार पर इस कार्य को अंजाम दिया जा सकता है ।
मैंने चुनाव के समय पर ही सदस्यों को उपनियम पर सबसे ज्यादा विचार विमर्श, अनुशीलन करते  पाया है । पंजीयन के समय उपनियम पर सबसे ज्यादा माथापच्ची निरीक्षक को ही करते पाया हूं । विभाग जब संशोधन प्रस्तावित करता है तब इसे मात्र लिपिकीय कार्य तक ही सीमित कर दिया जाता है । विरले ही अवसर पर उपनियम को चर्चा का विषय होते देखता हूं । जबकि संस्था के लिये यही संविधान है । परन्तु इसकी कद्र यह होती है कि किसी किसी संस्था में इसकी फ़ाइल ही नहीं मिलती है । जरुरत पर रजिस्ट्रार कार्यालय से फ़ोटोकापी कराकर संधारित की जाती है । 
उपनियम में समिति के कार्य के अनुरूप हिस्सा राशि , प्रवेश शुल्क नियत कर लिया जाना चाहिए । मेरी राय में न्यूनतम  हिस्सा  राशि पर्याप्त होनी चाहिए । मेरे अनुभव में इस पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है । क्योंकि सदस्य को किसी तरह से पंजीयन कराना उद्देश्य होता है । जबकि निरीक्षक का उद्देश्य समिति के सफल संचालन से होता है ।
हिस्सा राशि ही संस्था की पूंजी का मूल आधार होता है । सदस्यों का जितना हिस्सा संस्था में लगेगा उतना ज्यादा सदस्यों की रुचि संस्था के संचालन में रहेगी । यहां यह उल्लेखनीय होगा कि अगर सदस्य संस्था का पंजीयन राजकीय या अन्य कोई ठेका लेने के लिये या कन्ट्रोल की शोप आवंटन कराने के लिये या मछली के आखेट के लिये तालाब का ठेका लेने के लिये करना चाहते हैं तो वे क्यों न्यूनतम हिस्सा राशि को बडी राशि का रखेंगे । सहकारी समिति बीच के दलालों से मुक्त कराने के लिये होती है परन्तु तथाकथित नेतागण समिति पंजीयन कराकर ठेका या कंट्रोल की दुकान आवंटित करा लेते है तथा किसी और से कार्य कराते हैं । सभी सदस्यों की उपस्थिति से कार्य की जानकारी सभी को हो जाती है । सभी की उपस्थिति से जनता का दबाव भी बनता है । समिति को होने वाली हानि या लाभ  में सदस्यों की हिस्सेदारी की चर्चा जरुर की जानी चाहिये । ताकि केवल अध्यक्ष और सचिव ही सर्वेसर्वा नही बनें । सदस्यों का महत्त्व और दबाव बने रहना चाहिये । अभी क्रेडिट सहकारी समितियों की स्थिति देखें उसमें भी सभी सदस्यों को जानकारी नहीं होना भी एक कारण है साथ ही सभी सदस्यों की समुचित हिस्सा और अमानत भी समिति में लगा हो तो ऐसी स्थिति नहीं आ पाती है । महिला सहकारी समितियों की स्थिति में और भी ज्यादा चिन्ताजनक स्थिति है क्योंकि वास्तव में महिला को तो कुछ पता ही नहीं है । अधिकांश में महिला सदस्यायें केवल अंगूठा लगाने का ही काम करती है । उनके साथ आने वाले पुरुष ( पति, पिता, भाई या अन्य कोई संबन्धी ) ही जानकारी रखते हैं तथा निर्णय करते हैं । कभी - कभी अंगूठा का छाप भी पुरुष साथी ही कर देता है और अपने निरीक्षक साथी प्रस्ताव को प्रमाणित करने के लिये अभिशप्त है । निरीक्षक साथी किस आधार पर तथाकथित अंगूठा के छाप को चुनौती देवें । क्योंकि उन्हें पता है कि महिला अपने अंगूठा को स्वीकार कर लेवेगी । लेकिन गलत तो गलत है । परन्तु ऐसे निरीक्षक को केवल पंगाबाज, दायित्त्वों से बचने वाला कह कर चुप होने को बाध्य कर दिया जाता है । जब बहुत बडी समस्या आती है तभी इन छोटी छोटी बातों पर विचार किया जाता है । 
2 - इच्छुक सदस्यों का विस्तृत विवरण जैसे नाम , पिता या पति का नाम , जाति , उम्र , निवास , वारिस, वारिस से सबंध एवं वारिस की उम्र , हस्ताक्षर आदि संकलित करना होता है । सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि सदस्य का हस्ताक्षर निरीक्षक के सामने होना चाहिए । अन्यथा दूसरे लोग अन्यत्र के लोगों को भी सदस्य बना देते हैं यहां तक कि मृत को भी सदस्य बनवा देते हैं जो निरीक्षक के लिए कभी मुसीबत का सबब बन सकता है । सभी सदस्यों की फोटोयुक्त आई. डी. रेकार्ड में सम्मिलित करानी चाहिये । 
मेरे अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि प्राथमिक आम सभा में भी सभी प्राथमिक सदस्यों की उपस्थिति सुनिश्चित नही हो सकती है । जब प्रथम अवसर पर ही सदस्य समय नहीं दे सकता है तो भविष्य में उससे क्या अपेक्षा की जा सकती है । मेरे अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि जो काम करने में मुझे दिक्कत महसूस हुई उसे मेरे साथी बहुत आसानी से कर देते हैं । यहां मैं काल्पनिकता का सहारा लूंगा । जैसे महिला सहकारी समिति का पंजीयन का काम है तो मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि सभी ईच्छुक सदस्यायें मेरे सामने ही हस्ताक्षर करें या अंगूठा लगायें । इसी प्रकार से अन्य समितियों के पंजीयन के समय में भी पूर्तियां सख्ती से अपेक्षित है । लेकिन साथी लोग इन कामों को बहुत तुच्छ मानकर ज्यादा झमेला नहीं करते हैं । यहां निहितार्थ कुछ और भी व्यक्तिगत अपेक्षायें और पूर्तियां हो सकती है जिस पर चर्चा करना उचित नहीं होगा । लेकिन निहितार्थों से मुक्त होकर और कुछ कष्ट झेलकर हम अपनी मर्यादा और सम्मान को बढा सकते हैं ।
3 - सदस्य को अलग अलग परिवार का होना चाहिए । इसकी पूर्ति के लिए स्थानीय प्रशासन से प्रमाण पत्र ले लिया जाता है ।
4 - प्रस्तावित संस्था में कार्यकारिणी का चुनाव भी इसी आम सभा में कराया जाता है ।
5 - सदस्यों से संग्रहित हिस्सा राशि एवं प्रवेश शुल्क को सहकारी बैंक में जमा करा कर जमा की रसीद की छाया प्रति पंजीयन पत्रादि के साथ संलग्न की जाती है । यहां यह ध्यान देना उचित होगा कि संग्रहित राशि के अधिकाँश या समुचित राशि सहकारी बैंक में जमा कराया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए । क्योंकि कभी - कभी इच्छुक सदस्यगण रोशन दर्शाकर पंजीयन की कार्यवाही करा लेते हैं । अगर संस्था चलती है तो राशि संग्रहित करते हैं अन्यथा संस्था के निष्क्रिय होने की स्थिति में रोशन अप्राप्त रोशन  ही बना रह जाता है जो एक तरह से नकली काम बन कर रह जाता है ।
6 - प्रस्तावित समिति का प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाकर उसमें समिति की लाभदायकता को प्रदर्शित करना होता है । इसके लिए समिति द्वारा किये जाने वाले कार्य का विस्तृत विवेचन किया जाता है । प्रोजेक्ट रिपोर्ट विशेषज्ञ की देख रेख में ही तैयार की जानी चाहिए । निरीक्षक के द्वारा समस्त प्रकार के प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने की योग्यता नहीं होती है । जैसे राइस मिल या ग्रेडिंग यूनिट या कोल्ड स्टोरेज का प्रोजेक्ट बनाना सामान्यतया सहकारी निरीक्षक के वश का नही है । इच्छुक सदस्यों से सहयोग लेकर या कंसल्टेंट को उचित पारिश्रमिक दिलाकर प्रोजेक्ट रिपोर्ट  तैयार कराई जानी संस्था के भविष्य के लिए ठीक रहता है ।
7 - कतिपय प्रकार की सहकारी समितियों में कुछ अन्य पूर्तियां भी अपेक्षित होती हैं । जैसे क्रेडिट सहकारी समितियों में सदस्यों के हैसियत प्रमाणपत्र अपेक्षित होता है ।  मत्स्य उत्पादक सहकारी समितियों में जलीय भाग की उपलब्धता से सम्बंधित आंकड़े । ज्यादा बेहतर हो अगर मत्स्य विभाग से सिफारिश ले ली जाय । इसी प्रकार से विशिष्ट प्रकार की समितियों के लिए अलग अलग पूर्तियां अपेक्षित हैं ।
समस्त पूर्तियां कराने के बाद निरीक्षक अपनी सिफारिश के साथ पत्रादि प्रस्तुत करता है । पंजीयन के समय निरीक्षक की सिफारिश अपरिहार्य होती है ।




साथियों आप सभी का व्हाट्स एप पर बने ग्रुप मे तारीफ़ वाली बातें पढ़ कर मैं अभिभूत हो गया । वास्तव में मेरा मन्तव्य कभी तारीफ़ पाने का तो था ही नहीं । या यूं कहे  कि ऐसी कल्पना का तो कोई मतलब ही नहीं था । अभी भी नहीं है ।
मेरा आप सबसे एक ही निवेदन है कि ब्लोग्ग में लिखी गई बातों में अगर आप को कुछ अतिरेक लगे तो उसमें कटौती करने के लिये कृपया टिप्पणी करें । इसी प्रकार से अगर कुछ कमी रहती है तो उसे भी टिप्पणी के द्वारा इंगित कर मार्गदर्शन करें । मक्सद एक ही है कि इस मंच को निरीक्षक साथी अपनी समस्याओं, अपने उद्गारों , अपने नवाचारों के लिये उपयोग कर सकें ।
अपने नौकरी के दौरान हम लोग बहुत कुछ कहना, सुनना, होते हुए देखना चाहते है परन्तु अनेक कारणों से व्यक्त नहीं कर सकते हैं । हममें से अधिकांश लोग अभिव्यक्त करने में उतने पारंगत नहीं होते हैं या अन्तरमुखी होने के कारण या संकोचवश अपनी बात सभी के सम्मुख नहीं रख सकते हैं । बहुत बार हमारे साथी तो कभी अधिकारी भी उत्साहित करने के बजाय कटाक्ष कर देते हैं जिससे मन की बात मन में ही घुट कर रह जाती है ।
नौकरी के शुरुआत से ही हम अपने को आर. ए. एस. परीक्षा पास होकर आने के गुमान से नहीं निकल पाते है । कम से कम दस साल तो इसी में ही निकल जाता है । सीखने का और सम्मान बनाने का सबसे बेहतर अवधि यही होती है । उसके बाद नकारात्मकता से कब घिर जाते हैं हमे पता ही नहीं चलता । आज के डिजिटल युग में हम लोगों को ऐस मंच उपलब्ध हैं जहां हम अपने विचार को साझा कर सकते हैं तथा सथियों की राय प्राप्त कर सकते हैं । चूंकि हमारा कार्यक्षेत्र सहकारिता नियत हो गया है । ऐसे स्थिति में हमारी उपादेयता क्या हो सकती है इस पर मन्थन किया जाना अपेक्षित है । एक तरफ़ इनपुट तो दूसरी तरफ़ आउटपुट है ।  


बुधवार, 13 मई 2015

सहकारी निरीक्षकों के ग्रुप बनने से समस्त राजस्थान के निरीक्षकगण व्हाट्स एप पर लगातार अपने विचार / उदगार व्यक्त कर रहे हैं । मेरे एक साथी ने फोन पर अपनी शिकायत में बताया कि केवल पंद्रह से बीस लोग ही रूचि ले रहे हैं । यह बात एकदम सही है कि अधिकाँश लोग न तो अपने पोस्ट लिखते है और न ही प्रतिक्रिया ही व्यक्त करते हैं । मेरा मानना है कि इससे उनकी उदासीनता नहीं दीखती है । बल्कि अपने सर्विस काल के अधिकाँश समय वे लोग कभी एक दूसरे के संपर्क में रहे ही नहीं और अचानक उन्हें अन्यों के पोस्ट व्हाट्स एप जैसे प्लेटफॉर्म पर  देखने को  मिल रहा है । मेरी दृष्टि में इस युगांतरकारी तकनीकी साधन के प्रभाव को आत्मसात करने में कुछ समय लगेगा । लेकिन इस मंथन से बहुत कुछ अच्छा निकलेगा । 2 मई 2015 के दिन सहकार भवन के कन्फ़रेन्स हाल में निरीक्षक साथियों के वक्तृत्त्व क्षमता को देखकर पहली बार लगा कि साथियों में दम है ।
प्रथमतः पूरे राजस्थान के निरीक्षकगण एक तरह से सोचेंगे । सभी अपनी राय एक मंच पर व्यक्त करेंगे । इससे एकरूपता विकसित होगी । अभी सभी को अपने एसोसिएशन के गठन कराने की चिंता है । अपने सर्विस सम्बन्धी परिस्थितियों को  अनुकूल  बनाने की कोशिश करनी है ।
मुझे इसमें इससे बड़ी उम्मीद बनी है । निरीक्षकों के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियों को इस मंच पर साझा किया जाना चाहिए । इस क्रम में विचारण हेतु निम्न मुद्दों पर सभी की प्रतिक्रिया अपेक्षित है ।
1- निरीक्षकों का कार्य स्पष्ट होना चाहिए । कभी हम लोग दिन दौरा और रात्रि विश्राम की वर्त्तमान स्थिति ढूढने लगते है कभी हम सर्किल रजिस्टर संधारित करने के लिए मूल आंकड़े इकट्ठे करने लगते है । निरीक्षक का अपना कोई कार्यालय नहीं होता है । जिले के तहसील या पंचायत समिति स्तर पर निरीक्षक का  कोई अपना कार्यालय नहीं होता है । कोई सहकर्मी नहीं होता है । कभी मार्केटिंग में तो कभी बैंक शाखा में बैठने को कहा जाता है । स्टेशनरी और कार्यालय संचालन हेतु सामग्री अपेक्षित होती है ।
2- निरीक्षक के पद के साथ - साथ मार्केटिंग के अतिरिक्त कार्य को भी आवंटित किया जाता है । अगर निरीक्षक नहीं चाहे तो भी उसे अतिरिक्त कार्य दे दिया जाता है । जबकि जो मार्केटिंग के कार्य में शिद्धहस्त होते है उन्हें सामान्यतया नहीं दिया जाता है । मार्केटिंग का कार्य अपने में विशिष्ट प्रकार का कार्य होता है । किन परिष्टितियों में किया जाता है यह केवल भुक्तभोगी ही बता सकता है । यह कार्य सामूहिक रूप से सभी कार्मिकों के द्वारा मिलकर किया जाता है परन्तु निरीक्षक के कार्यकाल  के दौरान अगर कोई अनियमितता हो जाती है  तो ऐसा लगता है की उसके द्वारा ही किया गया है । उसे अपने बचाव में बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं । जब संस्था का लाभ हानि संस्था के सदस्यों की होती है । सभी कार्मिक बोर्ड के अधीन होकर काम करते हैं तो अनियमितता के उत्तरदायित्त्व के  लिए भी बोर्ड को क्यों नहीं शामिल किया जाता है । नई संस्था गठन कर दी जाती है परन्तु योग्य  कार्मिक की भर्ती नहीं होने से संस्था प्रभावित होती है । न्यूनतम वेतन पर योग्य कार्मिक नहीं मिल पाता है । नई गठित  ग्राम सेवा सहकारी समितियों तथा क्रय विक्रय सहकारी समितियों में इस  प्रकार की स्थिति ज्यादा देखने को मिल रही है ।
3- कहना तो नहीं चाहिए परन्तु साथी निरीक्षक भी अपने कार्य में पारंगत होने को प्राथमिकता नहीं देते हैं । वार्षिक नक़्शे का कार्य हो या अवसायन हो अथवा जांच हो हममे से अधिकांश लोग पारंगत नहीं होते हैं । हमारी ट्रेनिंग व्यवस्था भी एक एक की स्थानीय परिस्थितियों को देखे बिना ही करा दी जाती है । वास्तव में हम सभी चुप रहकर या यूं कहे कि प्रतिक्रियाविहीन होकर अपने को ज्यादा निरापद स्थिति में पाते हैं । ज्यादा बोलने पर समस्याएं भी ज्यादा हिस्से में मिल जाती हैं ।
4- निरीक्षक संवर्ग में से आत्महीनता का बोध निकालने की कोशिश कभी हुई ही नहीं । वैसे देखा जाय तो अपने विभाग के अधिकारियों में भी यह स्थिति है । इसके लिए हम लोगों का काम और उसमें योग्यता के अनुसार कार्य आवंटन नहीं होना भी एक कारण है । क्यों वही साथी अन्य पद मिलने पर सफल रहता है जबकि इस पद पर सामान्य रहता है ।
5- नौकरी के शुरुआत में आडिटर बनाम कार्यकारी का विवाद रहता था जो टीसता था । भगवान का शुक्र है कि वर्त्तमान में इससे निजात मिल गई है ।
6- जब किसी संस्था का पंजीयन किया जाता है उस समय बहुत लोग रूचि लेते है परन्तु जब संस्था अवसायन में आ जाती है तो उसके रेकॉर्ड तक ढूंढने में जोर आ जाता है । जैसे रजिस्ट्रेशन में बिना पूछे  कर दिया जाता है वैसे ही विज्ञापन निकालकर ऐतराज के बाद पंजीयन क्यों नहीं रद्द कर दिया जावे । अंतिम अवसायन के पहले अंतिम आम सभा बुलाने की औपचारिकता क्यों बनायी गई है । जब संस्था को चलाने में सदस्यगण रूचि नहीं ले रहे है  तभी तो अवसायन में आयी है । अंतिम आम सभा में वे सदस्य क्योंकर आएंगे । परन्तु निरीक्षक जो अवसायक भी है उसे अंतिम आम सभा बुलाने में सदस्यों को इकट्ठा करने में कितना जोर आता है । यहां फर्जी उपस्थिति भी लगाकर कार्य को किनारे लगाने में किसी को कोई ऐतराज नहीं होता है परन्तु गलत तो गलत है |
7- मुझे तीस वर्षों में भी कैश बुक लिखने में दिक्कत आती है । लेखों की जानकारी होने के बावजूद कैश बुक लिखने में मैं अपने आप को कई मौकों पर असमर्थ पाता हूँ । ऐसी स्थिति में नए लोग कैसे काम करते होंगे । मुझे याद है कि मेरे साथी जो जयपुर से स्थानांतरित होकर आये थे परन्तु उन्हें और उनसे भी वरिष्ठ को वार्षिक नक़्शे तैयार करने नहीं आता था जबकि नियम से सम्बंधित मुद्दों पर वे बहुत उम्दा थे ।  कार्य के दौरान विभिन्न अवसरों पर ऐसे मौके आते है जब हमें अपनी सीमाएं पता चलती हैं इस प्रकार के मुद्दों पर विचार करने हेतु  यह प्लेटफॉर्म बहुत उपयोगी साबित हो सकता है । क्योंकि इस प्लेटफॉर्म पर  अभिव्यक्त करने में कोई खतरा नहीं है । सभी के रचनात्मक प्रतिभा का उपयोग इस प्लेटफॉर्म पर किया जा सकता है ।


शुक्रवार, 8 मई 2015

सहकारी निरीक्षकों के एसोसियेसन से एक लाभ सभी को हुआ है । निरीक्षकगण जो कभी एक प्लेटफ़ोर्म पर नहीं होते थे वे आसानी से अपने को एक मंच पर पा रहे है जो पूरी तरह से लोकतान्त्रिक है । सभी अपने उदगार स्वतन्त्र तरीके से व्यक्त कर सकते हैं । 
मैंने सभी को ऑडिट एवम जांच पर चर्चा करते पाया हूं । मन आह्लादित हो उठा । क्योंकि अनेक प्रकरणों में प्रधान कार्यालय से किसी प्रकरण में स्पष्ट प्रावधान की जानकारी या मार्गदर्शन मांगने पर अधिनियम, नियम का उल्लेख कर समस्त प्रावधान उसमें निहित होने की जानकारी दे दी जाती है साथ ही अधिकार आप में ही निहित होने की लिख कर इतिश्री कर ली जाती है । जिले एवम इकाई स्तर पर पदस्थापित निरीक्षकगण को इससे कोइ मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है । सभी अस्पष्टता के शिकार होते हैं। अपने स्तर पर ही कार्य को किसी तरह से निपटाते है । दुखद पहलू यह है कि पूरे राज्य में एकरूपता  नहीं रह पाती। यह चर्चा इस दिशा में सभी पक्ष को एक सार्थक निर्णायक मुकाम तक ले जाने में सहायक हो सकती है । 
एक हमारे साथी की यह बात बहुत ही सटीक लगी जिसमें निरीक्षकों का कार्य स्पष्ट नहीं होने से उसका विजन (दृष्टि) अस्पष्ट एवम धुंधली हो जाना बताया गया  है । 
इसी प्रकार से निरीक्षकों एवम लिपिक वर्ग के कामों मे टकराहट या यूं कहे कि अहम के मुद्दे पर भी चर्चा हुई है । हालांकि इस विषय पर तर्क को बहुत ज्यादा बढाया जा सकता है ।
अलवर मे साथी  भाई के साथ किसी तरह की अशिष्टता अर्थात उनके प्रति अशिष्ट शब्द का प्रयोग होने से लगभग सभी साथी उद्वेलित है । इस सम्बन्ध मे तथ्य, सम्बन्धित पीड़ित साथी की अपेक्षा  एवम अध्यक्ष का निर्णय अपेक्षित है ।   
एसोसियेशन के रजिस्ट्रेशन का विषय सबसे ज्वलंत लम्बित विषय के रुप मे सभी के मन को मथती प्रतीत होती है ।  

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

आज 28.04.2015 की तैयारी बैठक से बहुत अच्छा संदेश मिला है कि सभी निरीक्षक सामूहिक शक्ति बढाने के लिये पूरी तरह से कृत्संकल्प हैं । जयपुर पदस्थापित निरीक्षक भाईयों को साधुवाद । साथियों के विचारों से यह तथ्य भी सामने आया कि किसी - किसी को इस मुहिम से जुड़े कुछ बातों को लेकर भ्रांति है जैसे कि चंदा को लेकर । किसी भाई का यह विचार कि चंदा लेकर निरीक्षक साथी धन उगाही करेंगे जिसे लगभग सभी ने एक स्वर में नकार दिया । निश्चित रुप से इतना जल्दी किसी पर आरोप लगाना अपने ओछेपन तथा अपनी जड़ता का प्रतीक है । उम्मीद और विश्वास के सहारे ही सामूहिकता का विकास होता है । आगे चलने वालों को यह विचार करना ही होगा कि आज के अविश्वास के युग में विश्वास जगाना बहुत दुष्कर कार्य है । सोये हुये को जगाना और निश्चल को सक्रिय करना भी कम मुश्किल कार्य नही है । परन्तु उन्हें यह भी विश्वास होना चाहिये कि बहुतों में उन्होंने आशा जगाई है । साथ ही स्वयं का विश्वास भी और ज्यादा दृढ़ करना होगा । बहुत जल्दी आहत होने से काम नहीं चलेगा । जय सहकार । 

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

सहकारी निरीक्षकों द्वारा व्हाट्स एप पर ग्रुप बनाकर अपने संवर्ग के हितों के लिये एकजुट होने की मुहिम चलाना देखकर बहुत अच्छा लगता है । मन  में दबी कुचली आकांक्षा मूर्त रुप ले रही हो तो मन की मुराद पूरी होने की कहावत चरितार्थ होती प्रतीत होती है । नये साथियों को इस कार्य के लिये साधुवाद ।
अभी 2 मई 2015 को निरीक्षकों के लक्षित एसोशिएसन की पहली बैठक की तिथि नियत की गई है । इस बैठक की सफ़लता के लिये पूर्व तैयारी स्वरूप 28 अप्रैल 2015 को जयपुर पदस्थापित निरीक्षकों की एक संक्षिप्त बैठक आयोजित की जा रही है ।
इस हेतु सभी ने मिलकर विभिन्न जिलों में पदस्थापित साथियों का नाम एवम उनका मोबाइल नम्बर संकलित किया है जिससे सभी से संवाद स्थापित हो सके । मेरे पूरे सेवा काल मे विभिन्न अंचलों के निरीक्षकों का इस तरह स्वयंस्फूर्त होकर जुडना आत्मविभोर करने जैसा है ।
मुझे इस सबमें जो बहुत अच्छी बात लगती है कि इससे आत्म सम्मान बढता है । जरुरी नहीं है कि इससे तात्कालिक लाभ हो परन्तु दीर्घ अवधि में इससे सामूहिक क्षमता निश्चित रुप से बढती है । इसकी सफलता के लिये सभी को अपने मेढकीय स्वभाव को त्यागना, अन्यों को भी महत्त्व देना, सामूहिक  महत्त्व के लिये अपने व्यक्तिगत हित को छोडना तथा सबसे जरुरी अपने राजनीतिक महात्वाकांछा को मर्यादित रखना होगा । जय सहकार ।