सहकारी निरीक्षकों के एसोसियेसन से एक लाभ सभी को हुआ है । निरीक्षकगण जो कभी एक प्लेटफ़ोर्म पर नहीं होते थे वे आसानी से अपने को एक मंच पर पा रहे है जो पूरी तरह से लोकतान्त्रिक है । सभी अपने उदगार स्वतन्त्र तरीके से व्यक्त कर सकते हैं ।
मैंने सभी को ऑडिट एवम जांच पर चर्चा करते पाया हूं । मन आह्लादित हो उठा । क्योंकि अनेक प्रकरणों में प्रधान कार्यालय से किसी प्रकरण में स्पष्ट प्रावधान की जानकारी या मार्गदर्शन मांगने पर अधिनियम, नियम का उल्लेख कर समस्त प्रावधान उसमें निहित होने की जानकारी दे दी जाती है साथ ही अधिकार आप में ही निहित होने की लिख कर इतिश्री कर ली जाती है । जिले एवम इकाई स्तर पर पदस्थापित निरीक्षकगण को इससे कोइ मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है । सभी अस्पष्टता के शिकार होते हैं। अपने स्तर पर ही कार्य को किसी तरह से निपटाते है । दुखद पहलू यह है कि पूरे राज्य में एकरूपता नहीं रह पाती। यह चर्चा इस दिशा में सभी पक्ष को एक सार्थक निर्णायक मुकाम तक ले जाने में सहायक हो सकती है ।
एक हमारे साथी की यह बात बहुत ही सटीक लगी जिसमें निरीक्षकों का कार्य स्पष्ट नहीं होने से उसका विजन (दृष्टि) अस्पष्ट एवम धुंधली हो जाना बताया गया है ।
इसी प्रकार से निरीक्षकों एवम लिपिक वर्ग के कामों मे टकराहट या यूं कहे कि अहम के मुद्दे पर भी चर्चा हुई है । हालांकि इस विषय पर तर्क को बहुत ज्यादा बढाया जा सकता है ।
अलवर मे साथी भाई के साथ किसी तरह की अशिष्टता अर्थात उनके प्रति अशिष्ट शब्द का प्रयोग होने से लगभग सभी साथी उद्वेलित है । इस सम्बन्ध मे तथ्य, सम्बन्धित पीड़ित साथी की अपेक्षा एवम अध्यक्ष का निर्णय अपेक्षित है ।
एसोसियेशन के रजिस्ट्रेशन का विषय सबसे ज्वलंत लम्बित विषय के रुप मे सभी के मन को मथती प्रतीत होती है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें