शनिवार, 16 मई 2015

सहकारिता के क्षेत्र में पहला कदम सहकारी समितियों के पंजीयन से शुरू होता है । किन्ही पंद्रह व्यक्तियों (कम ज्यादा भी हो सकते हैं ) के आवेदन से सहकारी समिति के पंजीयन हेतु आवेदन किया जाता है । इकाई कार्यालय में आवेदन आने पर इकाई अधिकारी किसी निरीक्षक को पंजीयन पत्रादि तैयार कराने हेतु लगा देते हैं । पूर्व में पंजीयन पत्रादि तैयार कराने से पहले संभाव्यता रिपोर्ट ( feasibility or viability report) भी तैयार कराते थे । परन्तु अब इस प्राथमिक कार्य को नजरअंदाज किया जाता है । हालांकि संभाव्यता रिपोर्ट से सहकारी समिति के सफलता पर निरीक्षक अपनी राय तकनीकी तरीके से दे सकते हैं । 
इस  सम्बन्ध में निरीक्षक से निम्नलिखित पूर्तियां कराया जाना अपेक्षित होता है -
1 - इच्छुक सदस्यों को पूर्व निर्धारित स्थान, दिन एवं  समय पर एकत्रित कर प्राथमिक आम सभा आयोजित कराना होता है । इसके पूर्व प्रस्तावित समिति का उपनियम तैयार करा कर सदस्यों के विचारार्थ प्राथमिक आम सभा में रखने की तैयारी करा ली जानी चाहिए ।
आदर्श उपनियम विभाग द्वारा बनाये गये हैं जिसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बिना मौलिक रुप से परिवर्तित किये संशोधन कर अपनाया जा सकता है । दिक्कत अन्य प्रकार की सहकारी समितियों के उपनियम में आ सकती है जिसमें विभाग द्वारा आदर्श उपनियम जारी नहीं किये गये हैं । यह मंच इस कार्य के लिये सभी से आदान प्रदान विचार - विमर्श कर जरुरत के हिसाब से उपनियम बनाने का काम कर सकता है । स्थानीय परिस्थितियों की मांग, आकांछायें, जरुरतें, सावधानियां आदि सम्मिलित करते हुए फ़ीड बैक के आधार पर इस कार्य को अंजाम दिया जा सकता है ।
मैंने चुनाव के समय पर ही सदस्यों को उपनियम पर सबसे ज्यादा विचार विमर्श, अनुशीलन करते  पाया है । पंजीयन के समय उपनियम पर सबसे ज्यादा माथापच्ची निरीक्षक को ही करते पाया हूं । विभाग जब संशोधन प्रस्तावित करता है तब इसे मात्र लिपिकीय कार्य तक ही सीमित कर दिया जाता है । विरले ही अवसर पर उपनियम को चर्चा का विषय होते देखता हूं । जबकि संस्था के लिये यही संविधान है । परन्तु इसकी कद्र यह होती है कि किसी किसी संस्था में इसकी फ़ाइल ही नहीं मिलती है । जरुरत पर रजिस्ट्रार कार्यालय से फ़ोटोकापी कराकर संधारित की जाती है । 
उपनियम में समिति के कार्य के अनुरूप हिस्सा राशि , प्रवेश शुल्क नियत कर लिया जाना चाहिए । मेरी राय में न्यूनतम  हिस्सा  राशि पर्याप्त होनी चाहिए । मेरे अनुभव में इस पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है । क्योंकि सदस्य को किसी तरह से पंजीयन कराना उद्देश्य होता है । जबकि निरीक्षक का उद्देश्य समिति के सफल संचालन से होता है ।
हिस्सा राशि ही संस्था की पूंजी का मूल आधार होता है । सदस्यों का जितना हिस्सा संस्था में लगेगा उतना ज्यादा सदस्यों की रुचि संस्था के संचालन में रहेगी । यहां यह उल्लेखनीय होगा कि अगर सदस्य संस्था का पंजीयन राजकीय या अन्य कोई ठेका लेने के लिये या कन्ट्रोल की शोप आवंटन कराने के लिये या मछली के आखेट के लिये तालाब का ठेका लेने के लिये करना चाहते हैं तो वे क्यों न्यूनतम हिस्सा राशि को बडी राशि का रखेंगे । सहकारी समिति बीच के दलालों से मुक्त कराने के लिये होती है परन्तु तथाकथित नेतागण समिति पंजीयन कराकर ठेका या कंट्रोल की दुकान आवंटित करा लेते है तथा किसी और से कार्य कराते हैं । सभी सदस्यों की उपस्थिति से कार्य की जानकारी सभी को हो जाती है । सभी की उपस्थिति से जनता का दबाव भी बनता है । समिति को होने वाली हानि या लाभ  में सदस्यों की हिस्सेदारी की चर्चा जरुर की जानी चाहिये । ताकि केवल अध्यक्ष और सचिव ही सर्वेसर्वा नही बनें । सदस्यों का महत्त्व और दबाव बने रहना चाहिये । अभी क्रेडिट सहकारी समितियों की स्थिति देखें उसमें भी सभी सदस्यों को जानकारी नहीं होना भी एक कारण है साथ ही सभी सदस्यों की समुचित हिस्सा और अमानत भी समिति में लगा हो तो ऐसी स्थिति नहीं आ पाती है । महिला सहकारी समितियों की स्थिति में और भी ज्यादा चिन्ताजनक स्थिति है क्योंकि वास्तव में महिला को तो कुछ पता ही नहीं है । अधिकांश में महिला सदस्यायें केवल अंगूठा लगाने का ही काम करती है । उनके साथ आने वाले पुरुष ( पति, पिता, भाई या अन्य कोई संबन्धी ) ही जानकारी रखते हैं तथा निर्णय करते हैं । कभी - कभी अंगूठा का छाप भी पुरुष साथी ही कर देता है और अपने निरीक्षक साथी प्रस्ताव को प्रमाणित करने के लिये अभिशप्त है । निरीक्षक साथी किस आधार पर तथाकथित अंगूठा के छाप को चुनौती देवें । क्योंकि उन्हें पता है कि महिला अपने अंगूठा को स्वीकार कर लेवेगी । लेकिन गलत तो गलत है । परन्तु ऐसे निरीक्षक को केवल पंगाबाज, दायित्त्वों से बचने वाला कह कर चुप होने को बाध्य कर दिया जाता है । जब बहुत बडी समस्या आती है तभी इन छोटी छोटी बातों पर विचार किया जाता है । 
2 - इच्छुक सदस्यों का विस्तृत विवरण जैसे नाम , पिता या पति का नाम , जाति , उम्र , निवास , वारिस, वारिस से सबंध एवं वारिस की उम्र , हस्ताक्षर आदि संकलित करना होता है । सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि सदस्य का हस्ताक्षर निरीक्षक के सामने होना चाहिए । अन्यथा दूसरे लोग अन्यत्र के लोगों को भी सदस्य बना देते हैं यहां तक कि मृत को भी सदस्य बनवा देते हैं जो निरीक्षक के लिए कभी मुसीबत का सबब बन सकता है । सभी सदस्यों की फोटोयुक्त आई. डी. रेकार्ड में सम्मिलित करानी चाहिये । 
मेरे अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि प्राथमिक आम सभा में भी सभी प्राथमिक सदस्यों की उपस्थिति सुनिश्चित नही हो सकती है । जब प्रथम अवसर पर ही सदस्य समय नहीं दे सकता है तो भविष्य में उससे क्या अपेक्षा की जा सकती है । मेरे अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि जो काम करने में मुझे दिक्कत महसूस हुई उसे मेरे साथी बहुत आसानी से कर देते हैं । यहां मैं काल्पनिकता का सहारा लूंगा । जैसे महिला सहकारी समिति का पंजीयन का काम है तो मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि सभी ईच्छुक सदस्यायें मेरे सामने ही हस्ताक्षर करें या अंगूठा लगायें । इसी प्रकार से अन्य समितियों के पंजीयन के समय में भी पूर्तियां सख्ती से अपेक्षित है । लेकिन साथी लोग इन कामों को बहुत तुच्छ मानकर ज्यादा झमेला नहीं करते हैं । यहां निहितार्थ कुछ और भी व्यक्तिगत अपेक्षायें और पूर्तियां हो सकती है जिस पर चर्चा करना उचित नहीं होगा । लेकिन निहितार्थों से मुक्त होकर और कुछ कष्ट झेलकर हम अपनी मर्यादा और सम्मान को बढा सकते हैं ।
3 - सदस्य को अलग अलग परिवार का होना चाहिए । इसकी पूर्ति के लिए स्थानीय प्रशासन से प्रमाण पत्र ले लिया जाता है ।
4 - प्रस्तावित संस्था में कार्यकारिणी का चुनाव भी इसी आम सभा में कराया जाता है ।
5 - सदस्यों से संग्रहित हिस्सा राशि एवं प्रवेश शुल्क को सहकारी बैंक में जमा करा कर जमा की रसीद की छाया प्रति पंजीयन पत्रादि के साथ संलग्न की जाती है । यहां यह ध्यान देना उचित होगा कि संग्रहित राशि के अधिकाँश या समुचित राशि सहकारी बैंक में जमा कराया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए । क्योंकि कभी - कभी इच्छुक सदस्यगण रोशन दर्शाकर पंजीयन की कार्यवाही करा लेते हैं । अगर संस्था चलती है तो राशि संग्रहित करते हैं अन्यथा संस्था के निष्क्रिय होने की स्थिति में रोशन अप्राप्त रोशन  ही बना रह जाता है जो एक तरह से नकली काम बन कर रह जाता है ।
6 - प्रस्तावित समिति का प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाकर उसमें समिति की लाभदायकता को प्रदर्शित करना होता है । इसके लिए समिति द्वारा किये जाने वाले कार्य का विस्तृत विवेचन किया जाता है । प्रोजेक्ट रिपोर्ट विशेषज्ञ की देख रेख में ही तैयार की जानी चाहिए । निरीक्षक के द्वारा समस्त प्रकार के प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने की योग्यता नहीं होती है । जैसे राइस मिल या ग्रेडिंग यूनिट या कोल्ड स्टोरेज का प्रोजेक्ट बनाना सामान्यतया सहकारी निरीक्षक के वश का नही है । इच्छुक सदस्यों से सहयोग लेकर या कंसल्टेंट को उचित पारिश्रमिक दिलाकर प्रोजेक्ट रिपोर्ट  तैयार कराई जानी संस्था के भविष्य के लिए ठीक रहता है ।
7 - कतिपय प्रकार की सहकारी समितियों में कुछ अन्य पूर्तियां भी अपेक्षित होती हैं । जैसे क्रेडिट सहकारी समितियों में सदस्यों के हैसियत प्रमाणपत्र अपेक्षित होता है ।  मत्स्य उत्पादक सहकारी समितियों में जलीय भाग की उपलब्धता से सम्बंधित आंकड़े । ज्यादा बेहतर हो अगर मत्स्य विभाग से सिफारिश ले ली जाय । इसी प्रकार से विशिष्ट प्रकार की समितियों के लिए अलग अलग पूर्तियां अपेक्षित हैं ।
समस्त पूर्तियां कराने के बाद निरीक्षक अपनी सिफारिश के साथ पत्रादि प्रस्तुत करता है । पंजीयन के समय निरीक्षक की सिफारिश अपरिहार्य होती है ।




3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शानदार। ऐसा प्रतीत होता है कि जमीनी वास्तविकताओं को अनुभव के साथ जोड़कर सभी निरीक्षक साथियो के लिए मार्गदर्शिका तैयार की गयी है।

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  2. बहुत शानदार। ऐसा प्रतीत होता है कि जमीनी वास्तविकताओं को अनुभव के साथ जोड़कर सभी निरीक्षक साथियो के लिए मार्गदर्शिका तैयार की गयी है।

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