सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

फ़िर से सहकारी का चुनाव



                   दोस्तों मुझे सहकारी विभाग में काम करते हुए पर्याप्त समय हो गया परन्तु आज भी सहकारी समितियों के चुनाव कराने जाते समय बहुत तनाव का अहसास होता है । क्योंकि गांव के लोग जो कि सहकारी समितियों के सदस्य होते हैं कभी-कभी अत्यन्त भावुक होकर व्यवहार करने लगते हैं । उस समय तार्किक और विधिक रुप से उन्हें सन्तुष्ट कर पाना आसान नहीं होता हैं । आंशिक चुनाव में पुलिस जाब्ता भी नहीं के बराबर होता है । परन्तु लोगों की भावनायें उसी तरह की होती हैं । अकेला इन्सान कैसे चुनाव कराता है यह हम लोगों की मानसिक स्थिति को तौलकर ही जाना जा सकता है । 
                   यहां मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि जब आम चुनाव होता है तब वही प्रक्रिया बडे स्तर पर क्रियान्वित होते और उसमें तमाम संसाधनों का उपयोग होते देखने पर हमें अपने पर गर्व करने का मन करता है । पर इसकी आम मान्यता नहीं मिलने से अपने अन्दर तुच्छता का भाव भी पनपता है । खैर राजकीय कार्य को तमाम सीमाओं के बीच हमारे जैसे न जाने कितने लोग अंजाम दे रहे हैं और अपने को राज्यकर्मी होने के सुखद अहसास से महिमामंडित कर खुश हैं । मैं भी उनमें से ही एक हूं । कल सांगरिया ग्राम सेवा सहकारी समिति के अध्यक्ष का चुनाव कराने जाना है । भगवान से प्रार्थना है कि सब कुछ सकुशल सम्पन्न हो जाये । 

शनिवार, 7 जुलाई 2012

सहकारिता में व्यक्तिगत मान अपमान



बहुत दिनों के बाद आज मुझे समय मिला कि मैं कुछ लिख सकूं । मन में बहुत बातें आती है जिसे लिखने का मन करता है । परन्तु कई सीमाओं का अहसास होते ही मन अपनी सीमाओं को समझ कर मन मार लेता है ।
खैर मैं आज एक बहुत असामान्य बात को सबके सामने रखना चाहता हूं । सहकारिता मे कुछ अधिकार सबको निर्बाध रुप से मिला हुआ है जैसे खुली सदस्यता, कार्यक्षेत्र मे निवास करने वाले सदस्यों को समिति के द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं । मैं आज कल एक ऐसे प्रकरण की जांच से जुड़ा हूं जिसमें समिति अध्यक्ष अपने सदस्य को वैचारिक मतभेद होने के कारण ॠण सुविधा से वंचित करने के लिए निर्णय ले लियए  है तथा सभी के सुझावों के बावजूद मात्र अपने मान-अपमान की बात करते हैं । साथ ही जब इस प्रकार के प्रकरण राजनीतिक आयाम से जुड़ जाते है तो समझ ही लीजिए कि सामान्य कर्मी की स्थिति क्या होती है ? कर्मी अपने सर्वाइवल इन्सटिन्क्ट का सहारा लेने को मजबूर हो जाता है ।  

रविवार, 10 जून 2012

विदाई और स्वागत समारोह


बहुत दिनों के बाद आज मैं अपने इस ब्लोग पर आया हूं । पता नहीं क्यों मुझे लगा कि कभी-कभी इस ब्लोग पर अपने मन की बात को लिखना चाहिये ।
पृष्ठभूमि बता दूं कि कल मेरे अधिकारी का स्थानान्तरण होने पर विदाई दी गई थी साथ ही नये अधिकारी जी का स्वागत भी किया गया था । कनिष्ठ स्टाफ़ भी उपस्थित था । परम्परानुसार स्थानान्तरण पर जाने वाले अधिकारी के सम्मान में उनके कार्यकाल में किये गये कार्यों पर जबर्दस्त ढंग से तारीफ़ के पुल बांधे गये । ऐसा लगा कि उनके स्थानान्तरण से सहकारिता को अपूरणीय क्षति हो गई हो । इसके साथ ही नवागन्तुक अधिकारी जी के लम्बे विविधतापूर्ण कार्यानुभव से इस अंचल में सहकारिता में होनेवाली जबर्दस्त क्रांति की प्रतिध्वनि की मधुर गूंज सबके मन को आह्लादित कर रहा था ।
मेरा मन कहीं और ही धरातल पर विचरण कर रहा था। चूंकि मेरा भी कार्यकाल पर्याप्त अवधि का हो चुका है । मुझे समझ में नहीं आ रहा था इस आयोजन को मैं आज का आयोजन मानूं या पूरे कार्यकाल मे ऐसे आयोजनों की प्रतिकृति के रुप में ही इसे स्थान दिया जावे ।
हमेशा की तरह दूसरे क्षण ही इसे भूल जाने की बजाय मुझे लगा कि क्यों नहीं इसे अपने ब्लोग पर पोस्ट करुं । मेरा मन मात्र इसे यूं ही पोस्ट करने से हट कर है । हर समय मैने जाने वाले अधिकारी की कर्मठता, इमानदारी, न्यायप्रियता, सामाजिक प्रतिबद्धता की तोतारटन्त सूक्तियां इस समय की नजाकत के अनुसार सुनता रहा हूं । श्रोतागण कोई और नहीं बल्कि रोज-रोज उनके साथ काम करने वाले वे ही साथी थे जिनमें से अधिकांश पर वे झल्लाते एवम कुछ के साथ बहुत प्रसन्नमुद्रा मे रहते थे ।
यहां मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि झल्लाहट झेलने वाले वे ही कर्मचारी होते हैं जो या तो रुटीन के काम को अंजाम नहीं दे सके रहते हैं या लाभकारी नहीं होते हैं । जिनपर साहब का हमेशा प्रसन्न मुद्रा का आशीर्वाद बना रहता है वे आसानी से समझ में आने वाले आज के सफ़लतम कार्मिक की श्रेणी में आते हैं । यहां मैं यह भी बता दूं कि मैं ज्यादातर कोपभाजन झेलने वाले की श्रेणी में ही अपना स्थान आरक्षित करा पाता हूं । अनेक अवसरों पर मैनें भरसक कोशिश किया कि मैं भी क्यों नहीं अपने को सफ़ल एवम साहब का प्रिय कार्मिक बना सकता हूं । परन्तु अधिकांश बार मुझे असफ़लता ही हाथ लगी । अब तो मन के किसी कोने में प्रिय कार्मिक बनने की अभिला शा भी समाप्त प्राय हो चुकी है । 
    
नौकरी में आने के बाद जीवन के ऐसे अनेक गूढ रहस्यों का पता चला जो छात्र जीवन मे सीखे मूल्यों से सर्वथा भिन्न रहा। पता नहीं क्यों जीवन मे समय के साथ बदलने वाले जीवन मूल्यों के साथ मैं क्यों नहीं अपने को सफ़ल बनाने के लिये आज के अत्यन्त सफ़ल विषय प्रबंधन को क्यों नहीं पढा । खैर मुझे पता नहीं क्यों इसी में सुकून सा महसूस होता है ।
ऐसे अवसरों पर दोहरे मापदण्ड की सर्वस्वीकृति एवम सर्वमान्य होने को मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं । यहीं मेरी असफ़लता का सबसे बड़ा कारण बन जाता हैं । जीवन का बहुत बड़ा सक्रिय हिस्सा अपने मन के अनुसार जी लेने के बाद आज जब प्रबन्धन की इस शाखा को सीखने और अंगीकार, आत्मसात करने की अपरिहार्यता पैदा होती है तो मन मे एक टीस और कुंठा का अहसास होता है । यहां मैं आत्मग्लानि को प्रमुखता नहीं दूंगा । क्योंकि कहीं न कहीं इसमें आत्मसन्तोष की भी अनुभूति होती है ।
इस विदाई एवम स्वागत के अवसर पर मुझे भी बोलने का अवसर मिला था । मन में अनेक विचार उमर-घुमड़ रहे थे परन्तु मौके की नजाकत एवम अकेले पड़ने के भय तथा अन्यथा अर्थ नहीं निकाल लिया जाये इसी कारण से सभी वक्ताओं के समान ही मैं भी तोतारटंत सूक्तियों के सहारे अपने वक्तृत्व का परिचय देकर महौल को खुशनुमा बनाया । परन्तु मैं यह सोचने को मजबूर हो गया कि क्या हमारा जीवन इसी कार्य को करते रहने एवम खुशनुमा महौल को बनाये रखने के लिये है ।
अभी कुछ दिनों पहले सभी आपस में एक दूसरे पर जबर्दस्त ढ़ंग से आरोप-प्रत्यारोप लगा कर एक अलग ही दौर में शामिल थे । यही अधिकारी जी दूसरे अधिकारी  जी से एकदम सामन्जस्य नहीं बिठा पा रहे थे । परन्तु आज के अवसर पर सभी को सभी अत्यन्त ही दक्ष, अनुकरणीय नेतृत्व प्रदान करने वाले दीख रहे थे ।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

कोटा कर्मचारी सहकारी समिति (सभा नंबर108) का चुनाव

मेरे राजकीय सेवा के दौरान आवंटित कार्यों में से कोटा कर्मचारी सहकारी समिति (सभा नंबर108)का चुनाव कार्य अपने में एकदम चुनौती भरा काम था। बहुत डर लग रहा था की कैसे मैं इस काम को कर सकूँगा। परन्तु अपने वरिष्ट अधिकारियों एवं सहकर्मियों के सहयोग एवं आत्मीयता के कारण मै इस कार्य को करने में सक्षम हो सका हूँ।
सबसे पहले मैं अपने अधिकारी श्री बिस्ट साहब के मार्गदर्शन का ऋणी हूँ जिसके बिना मैं कार्य को शुरू ही नहीं कर पाता।उसके तत्काल बाद पंवार साहब,कमलेश जी के प्रारंभिक आत्मविश्वास बढ़ाने  वाले  सहयोग को भूल नहीं सकता जिसके कारण ही काम को अंजाम दिया जा सका है।इस क्रममें  समस्त  कार्यों की नींव डालने वाले हमारे राजीव तोमर जी के सहयोग एवं पूर्ण निष्ठा तथा समस्त समस्यायों के  समाधान में सक्षम उनके अमूल्य योगदान को किन शब्दों में याद करूँ।मेरे अत्यंत जिगरी झालावाड के  साथियों  के योगदानके लिए तो शायद शब्द ही छोटे हैं।किस तरह से  सभी ने अपनेको पूरी तरह से इस   मिसन में झोंक कर पूरा कराया। चाहे मांगीलाल जी हों, चाहें गहलोत जी हों या धीरज जी हों। सभी ने इस कार्य को मुझसे ज्यादा खुद का कार्य मान कर चुनाव कार्य को संपन्न करवाया। 

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

सहकारिता से परिचय

यूँ तो सहकारिता का मतलब किसी आर्थिक उद्देश्य से साथ-साथ कार्य कर अपनी बेहतरी करना है परन्तु राजकीय बैसाखी के कारण सहकारिता के सदस्यगण स्वयं अपनी बेहतरी के लिए स्वयं के संसाधनों पर कम विश्वास करते हैं तथा सरकार से ज्यादा अपेक्षा करते हैं |यह प्रवृत्ति ही सहकारिता के वर्तमान शोचनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार है |इसमें सरकार भी अपनी भूमिका कल्याणकारी राज्य होने के नाते ज्यादा मानने लगती है |यही से सहकारिता अपनी  अधोगति की ओर अग्रसर होने लगती है |आखिर क्यों सरकार की जिम्मेदारी सहकारिता को  बढ़ाने इसको पुष्पित-पल्लवित करने में होनी चाहिए |यह तो जनता की सीधी जिम्मेदारी होनी चाहिए की वह इसे किस तरह से चलाये | 
सरकारी दफ्तरों में सहकारी समितियों के पंजीयन के लिए जनता  कुछ अपेक्षाएं की जाती है  कि उनकी  संख्या इतनी होनी चाहिए, उनकी हिस्सा राशि भी इतनी होनी चाहिए परन्तु जब सहकारी समिति बंद हो जाती है तो उसके समापन के लिए सरकार से अपेक्षा होती है की इसका अवसायन प्रक्रिया पूरी तरह से व्यवस्थित रूप से सरकारी कर्मचारी सभी से लेने योग्य राशि को लेवें तथा चुकाने योग्य राशि को चुका कर अवसायन की प्रक्रिया को पूरा करेंगे |
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि आखिर जब सदस्य ही रूचि नहीं ले रहे है तो सरकार अपनी ऊर्जा को इस तरह से क्यों अपव्यय कर रही है | जब बंद सहकारी समितियों की संख्या इतनी ज्यादा है तो इसी आधार पर क्यों नहीं इनका पंजीयन रद्द कर दिया जाता है?आखिर बंद सहकारी समितियों को  अवसायन के नाम पर बहुत लम्बे समय तक क्यों बचाए रखा जाता है? साथ ही अवसायन की प्रक्रिया को  इतना जटिल कर दिया गया है कि आसानी से अवसायन का काम पूर्ण नहीं हो पाता है | इस सारी  प्रक्रिया  की जड़ में सहकारिता का मूल उद्देश्य समाप्त हो जाता है तथा सरकारी काम शुरू हो जाता है जो सहकारिता के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है | यूँ तो कहा जाता है कि सहकारिता एक आन्दोलन है फिर इसमें सरकारी तरीके से काम क्यों किया जाता है? इसे आन्दोलन के रूप में क्यों नहीं लिया जाता है? क्यों नहीं मौके पर ही निर्णय किया जाता है? क्यों सरकार के भरोसे पर रहने की प्रवृत्ति पनपने दी जाती है?
मूलतः देश के नागरिकों में स्वावलंबन, परस्पर सहयोग की सीख सहकारिता से अच्छा कोई नहीं दे सकता है| लेकिन इसे सरकारी तरीके से नहीं चला कर आन्दोलन के तरीके से चलाने पर ही संभव है|

सहकारिता से परिचय

 भगवान को कोटिशः नमन कि आज हम लोग इस योग्य बन सके है कि अपनी बात को सबके सामने यूँ रख सकते है ताकि सभी उसे पढ़ और उसपर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते है | मै अपने सभी साथियों, मार्गदर्शकों, अग्रजों से निवेदन करता हूँ कि वे अपना  मार्गदर्शन देकर  मेरे इस तुच्छ  अदने से प्रयास को एक सार्थक उद्देश्यपरक मुहिम में बदल सकते हैं |
सबसे पहले मैं अपना मंतव्य स्पष्ट करना  चाहूँगा कि इस ब्लोग्ग के जरिये मैं सहकारिता में होने वाले  कार्यों तथा उससे जुड़े हुए सभी महानुभावों  को इस ब्लोग्ग के जरिये अपने विचार को  साझा करने के  लिए आमंत्रित करता हूँ | मैं स्वयं सहकारिता से जुड़कर अपना जीवन-यापन करता हूँ |  सहकारिता  विभाग  राजस्थान में मैं एक कार्मिक हूँ | मेरे समझ में सहकारिता  कभी एक जीवन दर्शन हुआ करती थी परन्तु आज इसे  वर्तमान से सामंजस्य बिठाने  की महती आवश्यकता हो गयी है |  निश्चित रूप से  यह  कमजोर वर्ग के लिए मूलतः लक्षित करके  उनकी संगठित शक्ति को शक्ति प्रदान करने के हथियार के रूप में उपयोग में लाई गयी है | लेकिन वर्तमान में कमजोर वर्ग इसका  उपयोग अपने बेहतरी  के लिए  नहीं  कर पा रहा है |