बहुत दिनों के बाद आज मैं अपने इस ब्लोग पर आया हूं । पता नहीं क्यों मुझे लगा कि कभी-कभी इस ब्लोग पर अपने मन की बात को लिखना चाहिये ।
पृष्ठभूमि बता दूं कि कल मेरे अधिकारी का स्थानान्तरण होने पर विदाई दी गई थी साथ ही नये अधिकारी जी का स्वागत भी किया गया था । कनिष्ठ स्टाफ़ भी उपस्थित था । परम्परानुसार स्थानान्तरण पर जाने वाले अधिकारी के सम्मान में उनके कार्यकाल में किये गये कार्यों पर जबर्दस्त ढंग से तारीफ़ के पुल बांधे गये । ऐसा लगा कि उनके स्थानान्तरण से सहकारिता को अपूरणीय क्षति हो गई हो । इसके साथ ही नवागन्तुक अधिकारी जी के लम्बे विविधतापूर्ण कार्यानुभव से इस अंचल में सहकारिता में होनेवाली जबर्दस्त क्रांति की प्रतिध्वनि की मधुर गूंज सबके मन को आह्लादित कर रहा था ।
मेरा मन कहीं और ही धरातल पर विचरण कर रहा था। चूंकि मेरा भी कार्यकाल पर्याप्त अवधि का हो चुका है । मुझे समझ में नहीं आ रहा था इस आयोजन को मैं आज का आयोजन मानूं या पूरे कार्यकाल मे ऐसे आयोजनों की प्रतिकृति के रुप में ही इसे स्थान दिया जावे ।
हमेशा की तरह दूसरे क्षण ही इसे भूल जाने की बजाय मुझे लगा कि क्यों नहीं इसे अपने ब्लोग पर पोस्ट करुं । मेरा मन मात्र इसे यूं ही पोस्ट करने से हट कर है । हर समय मैने जाने वाले अधिकारी की कर्मठता, इमानदारी, न्यायप्रियता, सामाजिक प्रतिबद्धता की तोतारटन्त सूक्तियां इस समय की नजाकत के अनुसार सुनता रहा हूं । श्रोतागण कोई और नहीं बल्कि रोज-रोज उनके साथ काम करने वाले वे ही साथी थे जिनमें से अधिकांश पर वे झल्लाते एवम कुछ के साथ बहुत प्रसन्नमुद्रा मे रहते थे ।
यहां मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि झल्लाहट झेलने वाले वे ही कर्मचारी होते हैं जो या तो रुटीन के काम को अंजाम नहीं दे सके रहते हैं या लाभकारी नहीं होते हैं । जिनपर साहब का हमेशा प्रसन्न मुद्रा का आशीर्वाद बना रहता है वे आसानी से समझ में आने वाले आज के सफ़लतम कार्मिक की श्रेणी में आते हैं । यहां मैं यह भी बता दूं कि मैं ज्यादातर कोपभाजन झेलने वाले की श्रेणी में ही अपना स्थान आरक्षित करा पाता हूं । अनेक अवसरों पर मैनें भरसक कोशिश किया कि मैं भी क्यों नहीं अपने को सफ़ल एवम साहब का प्रिय कार्मिक बना सकता हूं । परन्तु अधिकांश बार मुझे असफ़लता ही हाथ लगी । अब तो मन के किसी कोने में प्रिय कार्मिक बनने की अभिला शा भी समाप्त प्राय हो चुकी है ।
नौकरी में आने के बाद जीवन के ऐसे अनेक गूढ रहस्यों का पता चला जो छात्र जीवन मे सीखे मूल्यों से सर्वथा भिन्न रहा। पता नहीं क्यों जीवन मे समय के साथ बदलने वाले जीवन मूल्यों के साथ मैं क्यों नहीं अपने को सफ़ल बनाने के लिये आज के अत्यन्त सफ़ल विषय प्रबंधन को क्यों नहीं पढा । खैर मुझे पता नहीं क्यों इसी में सुकून सा महसूस होता है ।
ऐसे अवसरों पर दोहरे मापदण्ड की सर्वस्वीकृति एवम सर्वमान्य होने को मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं । यहीं मेरी असफ़लता का सबसे बड़ा कारण बन जाता हैं । जीवन का बहुत बड़ा सक्रिय हिस्सा अपने मन के अनुसार जी लेने के बाद आज जब प्रबन्धन की इस शाखा को सीखने और अंगीकार, आत्मसात करने की अपरिहार्यता पैदा होती है तो मन मे एक टीस और कुंठा का अहसास होता है । यहां मैं आत्मग्लानि को प्रमुखता नहीं दूंगा । क्योंकि कहीं न कहीं इसमें आत्मसन्तोष की भी अनुभूति होती है ।
इस विदाई एवम स्वागत के अवसर पर मुझे भी बोलने का अवसर मिला था । मन में अनेक विचार उमर-घुमड़ रहे थे परन्तु मौके की नजाकत एवम अकेले पड़ने के भय तथा अन्यथा अर्थ नहीं निकाल लिया जाये इसी कारण से सभी वक्ताओं के समान ही मैं भी तोतारटंत सूक्तियों के सहारे अपने वक्तृत्व का परिचय देकर महौल को खुशनुमा बनाया । परन्तु मैं यह सोचने को मजबूर हो गया कि क्या हमारा जीवन इसी कार्य को करते रहने एवम खुशनुमा महौल को बनाये रखने के लिये है ।
अभी कुछ दिनों पहले सभी आपस में एक दूसरे पर जबर्दस्त ढ़ंग से आरोप-प्रत्यारोप लगा कर एक अलग ही दौर में शामिल थे । यही अधिकारी जी दूसरे अधिकारी जी से एकदम सामन्जस्य नहीं बिठा पा रहे थे । परन्तु आज के अवसर पर सभी को सभी अत्यन्त ही दक्ष, अनुकरणीय नेतृत्व प्रदान करने वाले दीख रहे थे ।
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