यूँ तो सहकारिता का मतलब किसी आर्थिक उद्देश्य से साथ-साथ कार्य कर अपनी बेहतरी करना है परन्तु राजकीय बैसाखी के कारण सहकारिता के सदस्यगण स्वयं अपनी बेहतरी के लिए स्वयं के संसाधनों पर कम विश्वास करते हैं तथा सरकार से ज्यादा अपेक्षा करते हैं |यह प्रवृत्ति ही सहकारिता के वर्तमान शोचनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार है |इसमें सरकार भी अपनी भूमिका कल्याणकारी राज्य होने के नाते ज्यादा मानने लगती है |यही से सहकारिता अपनी अधोगति की ओर अग्रसर होने लगती है |आखिर क्यों सरकार की जिम्मेदारी सहकारिता को बढ़ाने इसको पुष्पित-पल्लवित करने में होनी चाहिए |यह तो जनता की सीधी जिम्मेदारी होनी चाहिए की वह इसे किस तरह से चलाये |
सरकारी दफ्तरों में सहकारी समितियों के पंजीयन के लिए जनता कुछ अपेक्षाएं की जाती है कि उनकी संख्या इतनी होनी चाहिए, उनकी हिस्सा राशि भी इतनी होनी चाहिए परन्तु जब सहकारी समिति बंद हो जाती है तो उसके समापन के लिए सरकार से अपेक्षा होती है की इसका अवसायन प्रक्रिया पूरी तरह से व्यवस्थित रूप से सरकारी कर्मचारी सभी से लेने योग्य राशि को लेवें तथा चुकाने योग्य राशि को चुका कर अवसायन की प्रक्रिया को पूरा करेंगे |
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि आखिर जब सदस्य ही रूचि नहीं ले रहे है तो सरकार अपनी ऊर्जा को इस तरह से क्यों अपव्यय कर रही है | जब बंद सहकारी समितियों की संख्या इतनी ज्यादा है तो इसी आधार पर क्यों नहीं इनका पंजीयन रद्द कर दिया जाता है?आखिर बंद सहकारी समितियों को अवसायन के नाम पर बहुत लम्बे समय तक क्यों बचाए रखा जाता है? साथ ही अवसायन की प्रक्रिया को इतना जटिल कर दिया गया है कि आसानी से अवसायन का काम पूर्ण नहीं हो पाता है | इस सारी प्रक्रिया की जड़ में सहकारिता का मूल उद्देश्य समाप्त हो जाता है तथा सरकारी काम शुरू हो जाता है जो सहकारिता के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है | यूँ तो कहा जाता है कि सहकारिता एक आन्दोलन है फिर इसमें सरकारी तरीके से काम क्यों किया जाता है? इसे आन्दोलन के रूप में क्यों नहीं लिया जाता है? क्यों नहीं मौके पर ही निर्णय किया जाता है? क्यों सरकार के भरोसे पर रहने की प्रवृत्ति पनपने दी जाती है?
मूलतः देश के नागरिकों में स्वावलंबन, परस्पर सहयोग की सीख सहकारिता से अच्छा कोई नहीं दे सकता है| लेकिन इसे सरकारी तरीके से नहीं चला कर आन्दोलन के तरीके से चलाने पर ही संभव है|